21 Sep 2013

Agnee

गुजारिशें करते रह गए हम,
 हर आने जाने वाले राही  से,
के एक पल रुक सके वो अगर दो  चार शब्दों के लिए,
तो मिलेगी ख़ुशी हमें,
धधकती धूप में चलने पर भी। 

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किसे होगी फुर्सत इतनी,
के अजनबियों के नाम अपनी शाम कर दे। 
हम तो अपनों से अजनबी हुए,
तन्हा ही जीना सीख गए। 
कहा हमसे कितनों ने, के 
ज़ंजीरें  तूने खुद बाँधी हैं। 

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लेकिन ग़म रहा नहीं कभी इस कदर मिट जाने का,
खुशबू हमारी रह जाएँगी फिज़ाओं में ,
के शब् का भी कभी कोई नाम रहा है?
जन्नतें हासिल होती नहीं सिर्फ ख्वाबों के बिनाह  पर, 
एक ख्वाहिश तो कर दिल मेरे, कदम तेरे खुद ब खुद ही बढ़ जाएँगे।

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4 comments:

Blasphemous Aesthete said...

के शब् का भी कभी कोई नाम रहा है?
जन्नतें हासिल होती नहीं सिर्फ ख्वाबों के बिनाह पर,
एक ख्वाहिश तो कर दिल मेरे, कदम तेरे खुद ब खुद ही बढ़ जाएँगे।


Kaash kadam jaante ke raah kaun si chun-ni hai mujhko, hichkichahat badhne ki nahi, wapis hatne ki hai :)

Nice post there Pradeeta.

Cheers,
Blasphemous Aesthete

Wings of Harmony said...

BA: Agar raah mein nazaare ho waise jaise dil chahta hai, toh kaun peeche hatna chahega....ummeed pe duniya kaayam hai!

Shukriya!:)

Mirage said...

Ahaaa.. :)

Wings of Harmony said...

@Mirage: :) :) Thank you!